उच्चारण के आधार पर हिंदी के स्वरों को पाँच भागों में बांटा जाता है — कंठ्य, तालव्य, ओष्ठ्य, कंठ-तालव्य और कंठ-ओष्ठ्य — और इसी वर्गीकरण के अंतर्गत कुल 11 स्वर (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ) आते हैं। नीचे हर भेद को उदाहरण और चित्र सहित विस्तार से समझाया गया है।
स्वर किसे कहते हैं?
जिन ध्वनियों के उच्चारण में हवा मुँह से बिना किसी रुकावट के सीधे बाहर निकलती है, उन्हें स्वर कहा जाता है। इन्हें बोलने के लिए किसी दूसरे वर्ण की सहायता नहीं लेनी पड़ती — यही गुण स्वर को व्यंजन से अलग बनाता है। हिंदी में कुल 11 स्वर माने जाते हैं: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।
उच्चारण के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण (स्वर के भेद)
स्वर बोलते समय जीभ मुँह के किस हिस्से को छूती है या किस हिस्से के पास पहुँचती है — इसी आधार पर स्वरों को पाँच वर्गों में बाँटा गया है। यही वर्गीकरण उच्चारण-स्थान (Place of Articulation) कहलाता है।
यह चित्र दिखाता है कि उच्चारण-स्थान के आधार पर सभी 11 स्वर किन पाँच वर्गों में बँटते हैं।
1. कंठ्य स्वर (अ, आ)
इन स्वरों का उच्चारण जीभ के पिछले हिस्से के गले (कंठ) के पास पहुँचने से होता है। मुँह सबसे ज़्यादा खुला रहता है, इसलिए ध्वनि साफ़ और गहरी सुनाई देती है। "अनार", "आम" जैसे शब्दों में यही स्वर सबसे पहले सुनाई देता है।
2. तालव्य स्वर (इ, ई)
इनमें जीभ का अगला हिस्सा तालु (मुँह की ऊपरी सतह) के पास उठता है। मुँह अपेक्षाकृत कम खुलता है और होंठ हल्के फैले रहते हैं — जैसे "इमली" और "ईख" में।
3. ओष्ठ्य स्वर (उ, ऊ)
इन्हें बोलते समय दोनों होंठ गोल आकार में आगे की ओर आते हैं। "उल्लू" और "ऊन" शब्दों में यह गोलाई साफ़ महसूस होती है।
4. कंठ-तालव्य स्वर (ए, ऐ)
ये मिश्रित स्वर हैं — इनके उच्चारण में जीभ का कुछ भाग गले की ओर और कुछ भाग तालु की ओर सक्रिय रहता है, इसलिए इन्हें कंठ्य और तालव्य दोनों गुणों वाला माना जाता है। "एक" और "ऐनक" में यह ध्वनि सुनी जा सकती है।
5. कंठ-ओष्ठ्य स्वर (ओ, औ)
इनमें गले और होंठ दोनों की भूमिका होती है — जीभ गले की ओर सक्रिय रहती है और साथ ही होंठ भी गोल होते हैं। "ओखली" और "औरत" जैसे शब्दों में यह दोहरा प्रभाव दिखता है।
उच्चारण-स्थान के आधार पर स्वरों की तालिका
| वर्ग | स्वर | उच्चारण कैसे होता है |
|---|---|---|
| कंठ्य | अ, आ | गले से |
| तालव्य | इ, ई | तालु से जीभ टकराकर |
| ओष्ठ्य | उ, ऊ | होंठ गोल करके |
| कंठ-तालव्य | ए, ऐ | गला और तालु दोनों से |
| कंठ-ओष्ठ्य | ओ, औ | गला और होंठ दोनों से |
| मूर्धन्य/दन्त्य | ऋ | जीभ मुड़कर मूर्धा/दाँतों के पास |
मुँह खुलने की मात्रा के आधार पर स्वर
उच्चारण-स्थान के अलावा स्वरों को इस आधार पर भी बाँटा जाता है कि उन्हें बोलते समय मुँह कितना खुलता है। यह वर्गीकरण तीन भागों में होता है — संवृत, अर्ध-विवृत और विवृत।
यह चित्र दिखाता है कि मुँह जितना ज़्यादा खुलता है, उच्चारण उतना ही अधिक विवृत होता जाता है।
होंठों की आकृति के आधार पर स्वर
एक और आधार है होंठों की स्थिति — बोलते समय होंठ गोल होते हैं या फैले हुए रहते हैं।
- वृत्ताकार (गोल) स्वर: उ, ऊ, ओ, औ — इनमें होंठ गोल और आगे की ओर आते हैं।
- अवृत्ताकार स्वर: अ, आ, इ, ई, ए, ऐ — इनमें होंठ गोल नहीं होते, सामान्य या फैली स्थिति में रहते हैं।
मात्रा (लंबाई) के आधार पर स्वर
उच्चारण-स्थान के साथ-साथ स्वर
✍️ Arpit Nageshwar
Post-graduated | Web Developer | +3 yr Experience